सकारात्मक परिवर्तन का केंद्र है लेखक गांव : डॉ कुमार विश्वास
उत्तराखंड(देहरादून),शनिवार 23 मई 2026
“मैं तुम्हें सपने देने आया हूं, बेचने नहीं। लेखक गांव जैसे स्थान ही उन सपनों को संस्कार और दिशा देते हैं।” प्रख्यात कवि एवं कथावाचक डॉ. कुमार विश्वास ने यह बात देश के पहले लेखक गांव, थानो में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में युवाओं को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि लेखक गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं का जीवंत केंद्र बनता जा रहा है, जहां नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ना सीख रही है।
प्रकृति के सुकुमार कवि एवं छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत की जयंती के अवसर पर लेखक गांव स्थित नालंदा पुस्तकालय एवं अटल प्रेक्षागृह में “सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम उत्तराखंड भाषा संस्थान, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय एवं लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का आयोजन नालंदा पुस्तकालय में किया गया, जहां बाल कवियों द्वारा सुमित्रानंदन पंत की कविताओं का भावपूर्ण काव्य पाठ किया गया। इसके उपरांत द्वितीय सत्र अटल प्रेक्षागृह में आयोजित हुआ, जिसका शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं बच्चों द्वारा लेखक गांव के कुलगीत “लेखक गांव हमारा है” के सामूहिक गायन के साथ हुआ। इस अवसर पर “सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ” पर आधारित लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
अतिथियों का स्वागत करते हुए लेखक गांव की निदेशक विदुषी निशंक ने कहा कि संवेदनाओं के जीवित रहने से ही साहित्य जीवित रहता है और साहित्य ही समाज को सही दिशा प्रदान करता है।
मुख्य अतिथि डॉ. कुमार विश्वास ने अपने संबोधन में कहा कि “यदि आपको एक कविता लिखनी है तो पहले हजार कविताएं पढ़नी होंगी।” उन्होंने युवाओं से मोबाइल पर बिताए जाने वाले समय को सीमित कर साहित्य और पुस्तकों के साथ अधिक समय बिताने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में युवा भारतीय संस्कृति और साहित्य से जुड़ रहे हैं और लेखक गांव इस सकारात्मक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है।
सुमित्रानंदन पंत को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि “पंत जी ने अपनी कविताओं में प्रकृति को केवल देखा नहीं, बल्कि जिया है। प्रयाग में रहने के बावजूद उन्होंने अपने भीतर उत्तराखंड हिमालय की आत्मा को सदैव जीवित रखा।” उन्होंने कहा कि लेखक गांव द्वारा पंत जी की साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास अत्यंत सराहनीय है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं लेखक गांव के संस्थापक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि पंत जी का साहित्य भारतीय चिंतन, प्रकृति और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि पंत जी की रचनाओं में हिमालय की चेतना, प्रकृति की पवित्रता और भारतीय संस्कृति की आत्मा समाहित है। लेखक गांव उसी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का एक सशक्त प्रयास है।
उन्होंने कहा कि लेखक गांव साहित्य, संस्कृति और रचनात्मक संवाद का राष्ट्रीय केंद्र बनकर उभर रहा है। “सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ” केवल एक पर्यटन पहल नहीं, बल्कि भारतीय साहित्यिक धरोहर को जन-जन तक पहुंचाने का अभिनव अभियान है। निशंक ने कहा कि लेखक गाँव पंत जी की जन्मभूमि और उनकी साहित्यिक चेतना से प्रेरणा लेकर उत्तराखंड को साहित्यिक पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने का कार्य कर रहा है।
विशिष्ट अतिथि पर्यावरणविद् पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि साहित्य और प्रकृति का संबंध अत्यंत गहरा है तथा उत्तराखंड की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण में साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भाषा संस्थान की निदेशक डॉ. मायावती ढकरियाल ने बच्चों से पंत जी के जीवन से प्रेरणा लेकर अध्ययन, साहित्य और रचनात्मकता के क्षेत्र में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के तृतीय सत्र काव्य पाठ का रहा। इस अवसर पर भारती मिश्र, डॉ. समा कौशिक, यामा शर्मा, डॉ. उषा झा, मणिक अग्रवाल, विजय तौरी, प्रीति मनराल, हरेन्द्र नेगी ‘तेजांश’, डॉ. दिनेश शर्मा ने अपनी कविताओं की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर डॉ. कमला पंत, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. शशांक शुक्ला एवं संजय महर ने भी सुमित्रानंदन पंत को स्मरण करते हुए बच्चों को संबोधित किया। कार्यक्रम का संयोजन पूजा पोखरियाल द्वारा तथा संचालन डॉ. बीना बेंजवाल एवं मोनिका शर्मा द्वारा किया गया।
इस अवसर पर भारतीय अभिनेत्री एवं फिल्म निर्माता डॉ. आरुषि निशंक, राज्य मंत्री ओमप्रकाश जमदग्नि, डॉ. नीरजा शर्मा कुकरेती, प्रो. प्रदीप भारद्वाज, डॉ. राकेश सुन्दरियाल, डॉ. बेचैन कंडियाल, अनिल शर्मा सहित देशभर से साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं युवा रचनाकारों ने सहभागिता की।