नर्सिंग अभ्यर्थियों के आंदोलन को मिला ‘मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति’ का समर्थन, मोहित डिमरी ने सरकार को घेरा
उत्तराखंड(देहरादून),गुरुवार 07 मई 2026
राजधानी के एकता विहार स्थित धरना स्थल पर पिछले 154 दिनों से अपनी मांगों को लेकर डटे नर्सिंग अभ्यर्थियों के आंदोलन को अब और मजबूती मिल गई है। ‘मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति’ के संस्थापक संयोजक और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी मोहित डिमरी ने धरना स्थल पहुँचकर अभ्यर्थियों के लोकतांत्रिक संघर्ष को अपना पूर्ण समर्थन दिया।
गौरतलब है कि नर्सिंग एकता मंच के नेतृत्व में चल रहा यह प्रदर्शन अब निर्णायक दौर में है, जहाँ पिछले 18 दिनों से अभ्यर्थी भूख हड़ताल पर बैठे हैं। आंदोलनकारियों से मुलाकात के बाद मोहित डिमरी ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
मोहित डिमरी ने कहा कि यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि जो नर्सिंग अभ्यर्थी अस्पतालों में मरीजों की सेवा कर रहे होने चाहिए थे, उन्हें पिछले पांच महीनों से सड़कों पर बैठने को मजबूर किया गया है। उन्होंने कहा, *”एक तरफ सरकार हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में करीब 3000 से अधिक नर्सिंग अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं। सरकार की उदासीनता के कारण न तो युवाओं को रोजगार मिल रहा है और न ही जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं।”
खबर के अनुसार, डिमरी ने भर्ती प्रक्रिया में हो रहे भेदभाव को ‘न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ’ बताया। उन्होंने कहा कि 2020 में आई भर्ती को 5 साल बीत जाने के बाद भी पूरा न कर पाना सिस्टम की बड़ी विफलता है।
समर्थन के दौरान मोहित डिमरी ने अभ्यर्थियों की निम्नलिखित मांगों को जायज ठहराते हुए सरकार से इन्हें तुरंत लागू करने की मांग की:
वर्षवार नियुक्तियां: नर्सिंग अधिकारी भर्ती को पूर्व की तरह वर्षवार (Seniority-based) आधार पर ही संपन्न किया जाए।
रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती: IPHS मानकों के तहत चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में खाली पड़े 2000 पदों पर एक साथ भर्ती निकाली जाए।
आयु सीमा में छूट: लंबे समय से भर्ती न होने के कारण जो युवा ओवरएज हो गए हैं, उन्हें विशेष आयु छूट प्रदान की जाए।
मूल निवासियों को प्राथमिकता: उत्तराखंड के युवाओं के हितों को देखते हुए भर्ती में प्रदेश के मूल निवासियों को वरीयता मिले।
मोहित डिमरी ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि शिक्षित युवाओं के धैर्य की परीक्षा लेना बंद करें। यदि सरकार ने समय रहते इन युवाओं की मांगों को नहीं माना, तो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा असर पड़ सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्वाभिमान और यहाँ की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की है।