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देहरादून का पल्टन बाजार बना उठाई गिरों का ठिकाना। 

 देहरादून का पल्टन बाजार बना उठाई गिरों का ठिकाना। 

देहरादून का पल्टन बाजार बना उठाई गिरों का ठिकाना। 

(भीड़ भाड़ इलाके में रहते हैं सक्रिय, दिन दहाड़े पर्स गायब) 

 

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून राज्य बनने के बाद से ही नये अवसरों का ठिकाना बना हुआ है लेकिन जिस ओर लोगों का बहुत कम ध्यान जाता है,वह है उठाईगिरों और उचक्कों का इस हद तक पनपना।

उत्तराखंड सरकार में प्रथम श्रेणी की राजपत्रित उच्चाधिकारी श्रीमती गीतांजलि शर्मा गोयल जो कल शाम करीब आठ बजे पल्टन बाजार में कोतवाली के पास कामिनी साड़ी सेंटर के पास से स्कूटर द्वारा अपने यमुना कालोनी आवास को चलीं। स्कूटर पर उनकी किशोर वय पुत्री कशिका गोयल बैठी थी। कशिका के कंधे पर एक छोटा सा बैग लटका हुआ था जिसकी पाकेट ( बैग की बगल में छोटी सी जेब) में उनकी मां श्रीमती गीतांजलि शर्मा गोयल का पर्स रखा हुआ था। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। हम सब ऐसा ही करते हैं।

श्रीमती गीतांजलि शर्मा गोयल ने घंटाघर के पहले पल्टन बाजार में मशहूर गैलार्ड आइसक्रीम के सामने पूरी सड़क को घेर आइसक्रीम खाते भारी भीड़ देखी जिसे पार करने में उन्हें चार-पांच मिनट का समय लग गया। यहां इतनी भीड रोज की सामान्य बात है जिसके देहरादून वासी अभ्यस्त हो चुके हैं। आगे बढ़ने पर उन्हें थोड़ा जाम बिन्दाल पुल के पास मिला और वहां भी उन्हें एक-डेढ मिनट लग गया।

श्रीमती गीतांजलि शर्मा गोयल ने घर जाकर पाया कि बेटी के बैग की जेब में रखा उनका पर्स नदारद है। पर्स में एक मंहगा एप्पल ब्रांड का आई फोन, उनका आधिकारिक परिचय पत्र, आधार कार्ड,पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, क्रेडिट कार्ड, चार एटीएम कार्ड, अन्य जरूरी ऐसे ही और सामान के साथ करीब ढाई हजार रुपए थे। दो जगह उन्हें भीड़ का सामना करना पड़ा, वहीं कोई पर्स उड़ाने की ताक में था और मौका पाते ही उसने अपने हाथ का कमाल दिखा दिया।

श्रीमती गीतांजलि शर्मा गोयल के पति श्री राजकमल गोयल प्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें दुर्घटना का पता लगा तो उन्होंने तत्काल, करीब साढ़े नौ बजे पुलिस की हैल्पलाईन पर सूचना दी और सुबह होते ही पुलिस चौकी धारा पर लिखित शिकायत दी।

अभी जैसे क्लाईमैक्स बाकी था। पुलिस से ही पता चला कि भीड़ भरे जिन स्थानों पर ऐसी वारदातें अक्सर होती है, वहां सीसीटीवी काम ही नहीं करते। यहां तक कि गैलार्ड जिसके सामने रोज देर रात तक मेला लगता है, वहां भी नहीं।

ऐसे में देखने की बात है कि पुलिस इस मामले में अंधेरे में हाथ पांव मार कर क्या कर पाती है और कब तक उठाईगीर को पकड़ पाती है।

देहरादून में इसी तरह ठक- ठीक गिरोह सक्रीय रहा है जिसने कार सवारों को भीड़ में लूटने का सिलसिला चलाया था। वे भी जोड़ी में भीड़ में, चौराहों पर कार चालकों का सामान उड़ाते हैं। उसमें तो पुलिस कोई सामान बरामद करा नहीं पाई थी और पीड़ित लोग इस पुलिस चौकी से दूसरी चौकी ,थाने के चक्कर लगा लगा कर थक-हार कर घर बैठ गये। अगर इस तरह की करीब- करीब स्थाई बन चुकी समस्या का भी पुलिस के पास कोई समाधान नहीं है तो अचानक होने वाले अपराधों में क्या करेगी।

Rakesh Kumar Bhatt

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